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प्रधानाध्यापिका की कलम से
॥ प्रतिभा पाई नहीं कमाई जाती है ॥

जि न्दगी के दो ही रास्ते हैं - संघर्ष या समर्पण। ये आपका चुनाव करना है कि आप समर्पण कर अपने अस्तित्व (वजूद) को मिटायेंगे या संघर्ष कर मंजिल पायेंगे।

आज से 15 वर्ष पहले इस निर्जन बंजर, मरुथलसदृश बिहटा की धरती पर विद्यालय खोलने की मेरी संकल्पना को बहुत लोगों ने दिवास्वप्न एवं बचकाना हरकत समझा पर इसका मूर्तरूप देखकर उन्हें विश्वास हो गया कि हमने संघर्ष का पथ चुन, उनके सामने एक मिसाल पेश की। कम समय में ही यह विद्यालय एक उत्कृष्ट विद्यालय के रूप में स्थापित होकर शिक्षा के क्षेत्र में स्वर्णिम संदेश दे रहा है कि “संकल्प के सामने कोई विकल्प नहीं होता।”

छात्र, शिक्षक एवं अभिभावक ये तीनों विद्यालय के हृदय हैं, पर विडम्बना यह है कि कई अभिभावक महोदय सारी जिम्मेदारी विद्यालय पर छोड़ देते हैं। ऐसे में बच्चों का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है, क्योंकि सर्वांगीण विकास में परिवार, समाज और विद्यालय तीनों का सामंजस्य होना बहुत जरूरी है।

बच्चों के सामने कभी भी नकारात्मक बातें न करें, उसे हर समय पुनर्बल देते हुए उसके सकारात्मक भावों को लगातार जागृत करते रहें, तो वे कम समय में चौंकाने वाले परिणाम दे सकते हैं।

अतः आप सब अभिभावकों से हमारी अपील है कि अपने बच्चों को किसी भी स्कूल में पढ़ाएं, केवल बाह्य सुंदरता पर न जाकर आंतरिक पठन-पाठन, अनुशासन व सुदृढ़ व्यवस्था को भी देखें। ये आपको चुनाव करना है कि आपके नौनीहाल, आपके समाज में अनुशासित बच्चे के रूप में प्रतिष्ठित हों या गैर-अनुशासित बच्चे के रूप में।

सोनी सिंह
M.A., B.Ed.
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